Wednesday, December 2, 2009

आज देश में भ्रष्टाचार को लेकर काफी कुछ चर्चाएँ होती है। भ्रष्टाचार कई तरह का होता है, लेकिन धन का भ्रष्टाचार आज उसका अभिप्राय बन चुका है। उसके रोज पैदा हो रहे नए तौर-तरीकों, स्वरुप, विस्तार और उसको घेरने के लिए मामूली तौर पर बहस इसलिए चलती है कि उसके खिलाफ जंग छेड़ने का वातावरण निर्मित नही हुआ है। यह रोग ऐसा जन्मजात लगता है कि जब से मानव की उत्पत्ति हुई है तब से ही उसके विकास का अहसास लगता है। इन्सान को जब ईश्वर ने पैदा किया तो कुछ दिलो-दिमाग उसे अपने अनुसार चलने को भी दिया। हमारे पुरातन ग्रंथो में कर्म करो और फल की चिंता न करने पर जोर दिया गया है। पर इन्सान इस विचार को अपने हिसाब और स्वार्थ से इस्तेमाल करना चाहता है। इसी कारण वह अपने अनुसार फल जबरन और अपनी इच्छा के अनुरूप पाना चाहता है। इसी चाहत में वह मनमर्जी करने लगता है। कभी जन्मान्तर की प्रवृतियों के कारण तो कभी अपनी अपने आसपास की चमचमाती जिन्दगी की चाहत में वह पथ से विचलित हो जाता है, जिससे उसमे भ्रस्ताचार का भूत उसे घेर लेता है। इस भूत कि भुल्भालैया में वह अपना स्वाभिमान और आत्मा को गदला कारण डालता है।
किसी के पास भोजन नही है तो वह चोरी करता अच्छा लगता है। हालाँकि चोरी करना ग़लत है, लेकिन को भूख मिटने कि लिए उसे करता है तो उसकी मजबूरी मानी जा सकती है। अच्छा खाते-पीते लोग उसे अपनाते है तो उनकी शोकिया भूख समझ से परे है। धन की बढ़ती भूख भ्रस्त होने के लिए प्रेरित करती है। अपनी आवश्यकताएं पुरी करने और उनको धन का मुलम्मा चढ़ाने के लिए मानव उसमे इतना धस जाता है कि उसे सही ग़लत का भान ही नहीं होता। मानव की ताकत का अंदाजा लगाने के लिए उसकी बल, धन, परिवार, वर्ग, धर्म आदि का इस्तेमाल देखा जाता है। हमारे पुरातन ग्रंथों में जीवन में धर्म, काम, अर्थ और मोक्ष को मुख्य तत्व बताया गया है। मानव ने धर्म और मोक्ष को एक तरफ़ रखकर अर्थ और काम को अपने गले से लगा लिया है। अर्थ मोह उसे पथ विचलित करने का कारण बन रहा है। कही धन बल का नशा, लालची प्रवृति, कही मकान-दुकान, दिखावा-पाखंड, अपने बच्चों का भविष्य चमकाने के नाम पर वह अधिकाधिक मात्रा में उसे अर्जित करना चाह रहा है। उसके लिए वह अपने पेशे के साथ खिलवाड़, धोखा, ठगी, मिलावट, जमाखोरी, उत्पीडन, शोषण आदि करके अपनी चाह पूरी करने में जुट जाता है। इससे उसके कर्म तो ख़राब होते ही है, आत्मा की शक्ति भी कमजोर हो जाती है जिसके कारण नैतिक बल कमजोर पड़ता जाता है।
शासन-प्रशासन उसके सामने लचर नज़र आता है। भ्रष्टाचार होते हुए भी उसके अस्तित्व के खिलाफ लड़ने की जहमत उठा नही पता। इक्का-दुक्का मामले पकड़े जाने पर ऐसा लगता है कि जाल डाला जा रहा है उसके खतमे के लिया, लेकिन जब कोई दूसरा बड़ा मामला समजने आता है तो फ़िर एक नई ख़बर सुनकर लगता है कि मछलिया समुद्र में बहुत है। पर दुःख कि बात है कि मछलियाँ इतनी छोटी-बड़ी और भयंकर हैं कि हरदम जाल डालने की आवश्यकता है। हमारे पास जाल भी कम है और जाल डालने वालों की इच्छा शक्ति भी कमजोर है। कहीं-कहीं तो जाल डालने वाले ही मछलियों से मिल जाते हैं। भ्रष्टाचार की आड़ में रक्षक भक्षक बनने की दौड़ में चूहों की तरह भागे जा रहे हैं। हमें अपनी इच्छाओं के सामने कहीं-न-कहीं लक्ष्मण रेखा खींचनी चाहिए, अपने जमीर को संभालना चाहिए। हम जिन बच्चों और परिवार के लिए धन जुटाना चाहते हैं वे हमारे पाप-कृत्यों के लिए हमारे हिस्सेदार होने वाले नहीं हैं तो फ़िर हम उनकी फिकरी में उनके नाम पर इतने अंधे क्यों हो रहे है। अगर हम जानबूझकर अंधे होना चाहते हैं तो हमें कौन रोक सकता है अँधा होने से। हमें हमारे से सीख लेने वाली पीढ़ियों और लोगो के बारें में सोचना चाहिए जो हमसे सीखकर अपने रास्ता बनायेंगे।