भारत में एक नै विचारधारा जन्म ले रही है. वह है, आलोचना. बहुत से लोग अनेक मामलों पर आलोचना करते तो दिखेंगे, लेकिन उस आलोचना में अपनी जिम्मेदारी नहीं तलाशेंगे. हमारे समाज में बिन मांगे सलाह देने वाले लोगों की कोई कमी नहीं है. सलाह देना अच्छा बात है, लेकिन सलाह का स्तर कैसा हो, यह एक मुश्किल और जोखिमभरा काम है वैचारिक और जिम्मेदारी के स्तर पर. अनेक मौकों पर, अनेक जगहों और जहाँ दो-चार लोग इकट्ठे हुए कि नहीं बहस और मुहबासे आरम्भ हो जाते हैं. समाज में ऐसा होना स्वाभाविक है, लेकिन जहाँ सुझावों और विचारों का दौर चलता है, वहां बहुत से लोग सिर्फ और सिर्फ प्रश्न खरे कटे दिखाई देते हैं, हल और उनके इलाज़ की जिम्मेदारी की जब बात आती है, तो पतली गली से वैचारिक और बौधिक स्तर पर एकदम पल्ला छाड़ लेना एक आम आदत की तरह नज़र आता है.
बात एकदम साधारण है, लेकिन है बड़ी गंभीर. हमारे यहाँ समाज नाम की इकाई वैसे भी दम तोड़ रही है, ऐसे में परिवार और सामूहिक बुनियाद का आचरण अपनी सांसे गिनता नज़र आता है. सब चाहते हैं कि हमारी व्यवस्था और सामाजिक जीवन में मूल्यों का टोटा दिनोंदिन बढता ही जा रहा है. यह व्यवस्था तभी मज़बूत होती है, जब त्याग, अनुशासन और सहनशीलता का वातावरण निर्मित हो. मोटे तौर पर बेझिझक स्वीकारना पड़ेगा कि त्याग और सब्र किसे कहते है, यह हमारे जीवन से तेज़ी से मिटता जा रहा है. इन गुणों के अभाव में क्या हम सोच सकते है कि क्या हम स्वस्थ और सभ्य समाज की ओर अपने कदम बढ़ा रहे हैं या केवल आलोचना के हथियार वाली तलवार को जहाँ कहीं भी निकाला, उठाया, उसका इस्तेमाल किया और फिर अपने म्यान में किसी अगले मौके के लिए वापस रख लिया.
निश्चित रूप से इस बात से सहमत नहीं हुआ जा सकता कि ऐसा करके हम क्या व्यवस्था को सुधार लेंगे या केवल आलोचना करके अपनी जिम्मेदारी की इतिश्री कर देंगे? ऐसा लगते है, हमें जीवन के विभिन चरणों में, पलायन की सहज प्रवृति अपनाने की आदत-सी पड़ गयी है. दूसरों पर जिम्मेदारी का ठीकरा फोड़ देने से क्या हमारी जिम्मेदारी दूर हो जाएगी, बेबुनियादी बहस केवल गाल बजने तक सीमित हो जाएगी, ये ऐसे यक्ष प्रश्न हैं, जो देश के बौधिक और देशभक्ति का जज्बा रखनेवाले लोगों को जरूर कचोटे हैं.
इन सब बातों पर गौर करने से ऐसा लगता है कि बौधिक लोग तो केवल विचार देकर अपनी जिम्मेदारी पूरा करना समझतें हैं. गंभीरता से सोचने वाले लोग, मन मसोसकर रह जाते हैं--क्या यही सतही और तथाकथित देशभक्ति हमारी कमजोर जड़ों को और कमजोर नहीं बना रही. देश में मोटामोटी आधे लोग तो ऐसे हैं, जिनको दो जून कि रोटी मिल जाये, वही उनके लिए जीवन संघर्ष का फल है. शेष करीब चालीस प्रतिशत लोग अपनी या अपने परिवार की सही तरह से प्रगति हो जाये, इसी सोच को पूरा करने में जुटे रहते हैं. मोटे तौर पर आज की व्यवस्था के आधार पर देखें तो देशभक्ति की उम्मीद का जिम्मा राजनीतिज्ञ, सरकारी नौकरशाह व कर्मचारियों की लम्बी-चौड़ी फौज और समाज-सेवकों पर आता है.
हमारे लिए मुश्किल और बुनियादी बात यह है कि क्या देशभक्ति की जिम्मेदारी केवल उन्हीं जमातों पर है, जो कई मामलों में दिग्भ्रमित और गैर-जवाबदेह हैं? ऐसा लगता है कि हम आज़ाद हुए अपने पूर्वजों के बलिदानों से, क्या हमने उसके बाद आज़ादी के मायनों को समझा, क्या हमने देशभक्ति के जरूरी संसाधनों को पोषित किया, क्या हमने उन जमातों की कार्यप्रणाली की खंगालकर, उनकी कमियों को दूर किया, जो देश को चलाने में प्रत्यक्ष और प्रत्यक्ष रूप से जुडी हुई हैं या यूँ कहें जिनको संविधान ने देश ढ ब्यवस्था चलने के प्रति जिम्मेदार बनाया है. आज संविधान के तीन स्तम्भ--विधानपालिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका अपनी बहुत-से जिम्मेदारियों से पीछे हट रही है और कोई ऐसी बुनियादी पहल भी नहीं हो रही है, जिससे ऐसा लगे कि उसमे लगे घुन को साफ़ या जड़ से ख़त्म करने की कोशेशें हो रही है. एक अघोषित परन्तु हमारे समाज में पहचान बनानेवाला चौथा स्तम्भ कभी-कभी कुछ मायनों में थोडा सक्रिय दिखाई पड़ता है, वह है पत्रकारिता. लेकिन इस व्यवसाय में भी बहुत से विकार उतनी ही तेज़ी से आयें है जितने तीनों स्तंभों में. पता नहीं चलता कि कौन पत्रकार और अख़बार समूह किस प्रछन्न प्रयोजन और भूमिका बल पर समाचार दे रहा है, किसकी पोल क्यों और कैसे खोल रहा है.
निश्चित रूप से हमने अपने विकारों का इलाज नहीं किया तो गुलामी की जिन जंजीरों को तोड़कर हमारे देशभक्तों ने जो सपने संजोये थे, उनको तोड़ने कि जिम्मेदारी से हम बच नहीं पाएंगे. हमारी जिम्मेदारी है कि हम देश और समाज को रसातल में जाने से रोंक सकें, तो रोक लें.
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