Thursday, December 9, 2010

क्या कहिये ?

क्या कहिये ?

व्यक्ति अपने को भगवान माने
तो फिर बताएं भगवान को क्या कहिये
जब लोगों के साथ है चलना
तो क्यों न रेत को भी पत्थर कहिये!

मर चुका है आत्मबल लोगों का
जो भी इच्छा हो, उन्हें कहिये!
दर्द की जब कोई दवा न हो
तो क्यों न फिर दर्द को ही दवा कहिये!

पेयजल को लोग हैं तरसते
फिर दरियादिली को क्या कहिये
संसार में लज्जा ताज जीने वालों को
फिर इंसानियत या हैवानियत की मूर्ति कहिये.

अब तो नकाबों पर भी नकाब चढ़े हैं
फिर असलियत क्या है, वह आप कहिये!
क्या है भलाई इसी में अपनी
सरासर झूठ को भी सच कहिये!

सोचना मगर फिर भी हमें है
सच को फिर क्या कहिये?
कुछ करने या कहने को
आज एक बहुत बड़ा जिगर चाहिए!

मंजिलें दूर अवश्य हैं अनजानी जिन्दगी की
मरना-जीना उसी का अंग कहिये!
अगर मर-मिट जाएँ स्वार्थ में
ऐसे में फिर परमार्थ को क्या कहिये!

ललकार है, पुकार है -
परिवार किए चक्कर में दंदफंद मत करिए
अपने को न भूलें इतना
की परिवार भी आपको बाद में भूल जाये
ऐसे में फिर परायों को क्या कहिये!

अपने पराये का भेद छोड़कर
धरती मान के लालों को अपना कहिये!
गंगा-यमुना को दूषित किया उन्होंने
जिनकी बाजुओं में 'दम' नहीं, बल्कि 'दंभ' था
अन्यथा गंदे नालों में क्या दम था.

उस समय हम क्या खाक करेंगे
जब हमारी सांसों में दम न रहेगा
सोच कर कहिये कि हम तब क्या करेंगे
जब यमराज बे-खटके-बे-टिकेट ले जायेंगे.

माना सीमा पर गोली खाना देशभक्ति है
पूछता हूँ आप जहाँ हैं, क्या वहां देशभक्ति नहीं है
अब तक दूसरों के लिए था कि क्या कहिये
जनाब, अब खुद से पूछिये-बताईए कि
ऐसे में आपकी भूमिका को क्या कहिये!


नहीं कहूँगा राम-कृष्ण, मौला, गुरुनानक, ईसामसीह बनिए

बनिए तो एक बार हनुमान जैसे बनिए
आग अपन की पूँछ में थोड़ी जरूर लगेगी
तभी हमारे 'जीवन की लंका' जरूर जलेगी
जनाब, यह होगा जब आपके इरादों में दम होगा
तब तो रावण वध करने श्रीराम दौड़े आएंगे!

बोलकर भी चुप हो जाएँ
सुनकर भी अनजान हो जाएँ
जानकार भी कुछ न कह पायें
तो फिर उसको क्या कहिये!
कुछ ऐसा करो जगत में मरकर भी अमर कहाओ!

हिंदी या हमारी मातृभाषा दौड़ी वहां जहाँ जन-जन था
फिर क्यों अंग्रेजी कर रही उसकी सिंह सवारी
यहीं तो अपनों की आयाती अंग्रेजी का गम था
तभी तो किस्ती वहां डूबी जहाँ पानी कम था.
जय हिंद.

वंदन है, अभिनन्दन है, आप मेरे सिर का चन्दन हैं.

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